Jammu-Kashmir Assembly Elections: संयुक्त गुपकार से जम्मू-कश्मीर में बीजेपी की उम्मीदों को लग सकता है झटका

Jk Election Pti

पीपुल्स अलायंस फॉर गुपकार डेक्लेरेशन (Gupkar Alliance) ने संयुक्त रूप से जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया है. यह फैसला कश्मीर में छोटे राजनीतिक दलों की जीत की संभावनाओं को खत्म कर सकता है. जबकि यहां अगली सरकार बनाने के लिए बीजेपी की योजना के लिए ये छोटे दल अहम हैं. राजनीतिक जानकारों के अनुसार, पीएजीडी की घोषणा ने कारोबारी से नेता बने अल्ताफ बुखारी (Altaf Bukhari) की जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी (JKAP) और सज्जाद लोन के पीपुल्स कॉन्फ्रेंस (JKPC) जैसे छोटे दलों के चुनावी गणित पर पानी फेर दिया है.

केंद्र शासित प्रदेश में दोनों दलों को बीजेपी के करीब माना जाता है. ये जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाने की उसकी योजना का हिस्सा हैं. यदि वे अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाएंगे तो बीजेपी जम्मू-कश्मीर विधानसभा में 46 सीटों के जादुई आंकड़े तक पहुंचने से पीछे रह सकती है. बीजेपी की कोशिश देश के एक और राज्य में सत्ता में आने की है.

क्या गुपकार गठबंधन समीकरण बदल सकता है?

गुपकार गठबंधन के अध्यक्ष डॉक्टर फारूक अब्दुल्ला के नेतृत्व में नेशनल कॉन्फ्रेंस और महबूबा मुफ्ती की पीडीपी 2014 के जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनावों में 87 में से 30 सीटों पर आमने-सामने की लड़ाई में थी.

सीपीआई (एम) नेता एमवाई तारिगामी के साथ, जो गुपकार का हिस्सा हैं, तीनों दलों ने 2014 के चुनावों में सामूहिक रूप से 44 सीटें हासिल कीं थीं. अगर 2014 के विधानसभा चुनावों को एक संकेत माना जाए तो लंगटे, सोपोर, बांदीपोरा, देवसर, शांगस, जास्कर, किश्तवाड़, डोडा और भद्रवाह निर्वाचन क्षेत्रों में गुपकार गठबंधन को बढ़त मिलेगी. इन सीटों पर इस गठबंधन के घटक दल 3000 से कम मतों से हारे थे. और दूसरे दल जीत गए.

मसलन, दक्षिण कश्मीर के शांगस विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के गुलजार अहमद वानी 3000 से कम मतों के अंतर से जीते थे. पीडीपी के पीरजादा मंसूर हुसैन दूसरे स्थान पर रहे जबकि नेशनल कॉन्फ्रेंस के रियाज अहमद खान को 10000 से अधिक वोट मिले थे. यदि नेशनल कॉन्फ्रेंस न होती तो पीडीपी उम्मीदवार को आसानी से जीत मिल सकती थी.

श्रीनगर के एक राजनीतिक जानकार का कहना है, “सामूहिक रूप से, जम्मू और कश्मीर में बीजेपी को रोकने के लिए पीडीपी और एनसी के पास पर्याप्त आधार हैं. लेकिन बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि वे गठबंधन को लेकर कितने गंभीर हैं. डीडीसी चुनावों में इस गठबंधन ने संयुक्त उम्मीदवार उतारने का फैसला किया था, लेकिन दोनों पार्टियों ने कुछ सीटों में अपने-अपने उम्मीदवार भी उतारे.”

सूत्रों के अनुसार, गुपकार गठबंधन जम्मू क्षेत्र की कुछ सीटों पर चुनाव पूर्व समझौता करने के लिए कांग्रेस के साथ भी बातचीत कर रहा है. ये वे सीटें हैं जहां बीजेपी उम्मीदवारों ने 2014 के विधानसभा चुनावों के दौरान मामूली अंतर से जीत हासिल की थी.

पलायन का मामला

केंद्र सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को खत्म करने और इसे दो केंद्र शासित प्रदेश बनाने के बाद, पीडीपी और एनसी को उनके वरिष्ठ नेताओं के पलायन का सामना करना पड़ा था.

पीडीपी और एनसी से जुड़े दो दर्जन से अधिक नेताओं ने अपनी-अपनी पार्टियां छोड़ दी थीं. इनमें से कुछ प्रमुख नाम जेकेपीसी नेता इमरान रजा अंसारी (पहले पीडीपी में थे), जेकेपीसी नेता बशारत बुखारी (पहले एनसी में थे), अपनी पार्टी के अध्यक्ष अल्ताफ बुखारी (पीडीपी), अपनी पार्टी के नेता जफर इकबाल मन्हास (पहले पीडीपी में थे) वगैरह हैं.

जेकेपीसी के आकलन के मुताबिक, पार्टी को अगले विधानसभा चुनाव में सात से दस सीटें मिलने की उम्मीद है. जेकेपीसी के एक नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “अपनी पार्टी और निर्दलीय (2014 के चुनावों में 3 निर्दलीय जीते थे) के साथ, अगले विधानसभा चुनाव में कश्मीर में एक नया समीकरण तैयार होगा.”

बीजेपी के गेम प्लान के लिए झटका

राजनीतिक हवा चाहे जिधर भी बहे लेकिन कश्मीर के प्रमुख क्षेत्रीय दलों द्वारा चुनाव में संयुक्त मोर्चा बनाने के फैसले ने बीजेपी के प्लान को झटका दे दिया है. हालांकि, बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि उनकी पार्टी जम्मू-कश्मीर में अपने दम पर सत्ता में आएगी.

इस बीजेपी नेता ने कहा, “2014 के चुनावों में बीजेपी द्वारा जीती गई सभी सीटों को हम बरकरार रखेंगे और कश्मीर में अपने प्रदर्शन में सुधार करेंगे. हमें बिना किसी बाहरी समर्थन के अपने दम पर सरकार बनाने का भरोसा है.” लेकिन अगर गुपकार गठबंधन बीजेपी के गढ़ जम्मू की चिनाब घाटी और पीरपंजाल क्षेत्रों में पैठ बनाने में कामयाब हो जाता है, तो बीजेपी को दिक्कत हो सकती है. इन इलाकों में पहले वोटों का बंटवारा एनसी, पीडीपी और कांग्रेस के बीच हुआ करता था. बीजेपी को 46 के जादुई आंकड़े को पाने लिए कश्मीर की पार्टियों पर निर्भर होना पड़ेगा.

एक राजनीतिक जानकार के मुताबिक, “जेकेएपी और जेकेपीसी कश्मीर में जीत हासिल करने के लिए वोटों के एनसी और पीडीपी के बीच विभाजन को भुनाने की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन गुपकार गठबंधन की घोषणा ने उनकी संभावनाओं को कम कर दिया है.”

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