Jammu-Kashmir: कश्मीर में आतंकवाद की नई ‘ खुफिया रणनीति’; सुरक्षाबलों की बढ़ी चिंता, आतंकवादियों तक पहुंच में हो रहे नाकाम

Kashmir Security Ptiyy6

जम्मू-कश्मीर (Jammu Kashmir) में आतंकवादियों पर नकेल कसने के लिए सुरक्षाबलों और खुफिया एजेंसियों को खासी रणनीति बनानी पड़ती है. बुरहान वानी (Burhan Wani) जैसे स्थानीय आतंकवादियों के उभरने में सोशल मीडिया का अहम रोल रहा लेकिन अब कश्मीर में आतंकवाद एक “गुप्त और खतरनाक” चरण में प्रवेश कर गया है, जिसने सुरक्षा तंत्र को काफी चिंतित कर दिया है. हालांकि सुरक्षाबल लगातार अलर्ट हैं और उनकी नापाक कोशिशों को नाकाम करने में लगे हुए हैं. सुरक्षा बलों (Security Forces) ने इस साल के शुरुआती छह महीनों में करीब 120 आतंकवादियों को मार गिराया है.

जम्मू-कश्मीर के शीर्ष पुलिस अधिकारियों ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि तीन दशकों में पहली बार, हम वास्तविक अर्थों में गुरिल्ला युद्ध देख रहे हैं. उनका कहना है कि हमारे रिकॉर्ड में करीब 200 सूचीबद्ध आतंकवादी हैं, जिन्होंने संगठनों के साथ अपनी संबद्धता की घोषणा की और फिर भूमिगत हो गए. लेकिन अब इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि हथियार हासिल करने वाले युवाओं की संख्या कहीं ज्यादा है.

1980 के दशक के बाद से, कश्मीरी आतंकवादियों को हमेशा पुलिस रिकॉर्ड में सूचीबद्ध किया जाता रहा है. आतंकवादियों में से कई ने सोशल मीडिया पर बंदूकें चलाने की तस्वीरें पोस्ट कीं, यह प्रवृत्ति युवाओं में बढ़ती जा रही है. हालांकि इसकी वजह से सुरक्षा एजेंसियों को उनके तक पहुंचने में काफी आसानी भी हुई.

लेकिन अब अधिकारियों का कहना है कि जहां तक नए आतंकवादियों का सवाल है तो “वे एक-दूसरे को जानते तक नहीं हैं.” दक्षिण कश्मीर में तैनात एक अधिकारी ने कहा, “हमारे जिले में केवल छह सूचीबद्ध आतंकवादी हैं, लेकिन हमें सूत्रों से जो इनपुट मिले हैं, वे आंकड़े 50 से अधिक बताते हैं. ये लोग कौन हैं, हम नहीं जानते. हम उनके आंतरिक घेरे में सेंध लगाने की लगातार कोशिश कर रहे हैं लेकिन यह आसान नहीं है.”

अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए, सैन्य अफसर ने फ्रांस के खिलाफ अल्जीरियाई विद्रोहियों के “गुप्त युद्ध” के बारे में 1966 की चर्चित फिल्म “द बैटल ऑफ अल्जीयर्स” का जिक्र किया. उन्होंने कहा, “हाल ही में, जब हमने एक युवक से पूछताछ की तो पता चला कि उसने पांच पिस्तौल बांटे थे. जब हमने उन लोगों की पहचान के बारे में जानना चाहा जिन्हें उसने पिस्तौल दी थी, तो वह बता नहीं सका. उसके हैंडलर ने उसे एक खास जगह पर रुकने और एक पिस्तौल लाल शर्ट पहने एक लड़के को सौंपने के लिए कहा था. वह लड़का आया, और उस दौरान वह नकाबपोश था, और वे एक-दूसरे को नहीं जानते थे.”

अधिकारियों के अनुसार, दक्षिण कश्मीर में इस तरह की नई घटना अधिक प्रचलित है, लेकिन इसकी छाप घाटी, खासकर श्रीनगर में दिखाई दे रही है. वे पुलिस और प्रवासी मजदूरों पर हाल में हुए हमलों के पीछे इस “बदलाव” को अहम कारण मानते हैं. इस साल अब तक 20 से अधिक ऐसे हमले हो चुके हैं.

पुलिस सूत्रों का यह भी कहना है कि “ये नए युवा तकनीकी रूप से मजबूत हैं” और नियंत्रण रेखा (Line of Control) के पार “हैंडलर के साथ उनके सुरक्षित संचार नेटवर्क” के कारण सुरक्षा रडार से बचने में सक्षम हैं.

दक्षिण कश्मीर में एक एसपी रैंक के अधिकारी ने कहा कि पुलिस को अब यह डर है कि वे मुखबिरों और गुप्तचरों के जरिए आतंकवादी संगठनों पर अपनी पकड़ खो रहे हैं और सूचना हासिल नहीं कर पा रहे हैं. उनमे कमांड संरचना गायब है. अब कोई आदेश देने वाला फोर्स नहीं है और यह इसे खतरनाक बना रहा है. अलगाववादी नेता जेल में हैं और जो बाहर हैं उनके तक पहुंच नहीं है. हम अब एक अदृश्य दुश्मन से संघर्ष कर रहे हैं.

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