14वें राष्ट्रपति ने सामूहिक हत्याकांड में मृत्युदंड पाए जिस मुजरिम की दया याचिका खारिज की…रूह कंपा देने वाली है उसकी कहानी

Ramnath Kovind

हिंदुस्तान के 14वें राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद (Ram Nath Kovind) का कार्यकाल चंद दिन बाद ही पूरा होने वाला है. ऐसे में जाते-जाते हिंदुस्तान के लोग उनके कुछ अहम फैसलों को याद कर रहे हैं. इन्हीं फैसलों में मृत्युदंड (Hang to Death) संबंधी वे दया-याचिकाएं भी शामिल हैं जिन पर रहम न खाकर, मौजूदा राष्ट्रपति (President of India) ने उन्हें खारिज कर दिया. वो फिर चाहे निर्भया के हत्यारों की दया याचिका रही हो या तीन-चार अन्य दया-याचिकाएं. इनमें हाल-फिलहाल सबसे ज्यादा चर्चा में है बिहार में अंजाम दिए गए एक परिवार के सामूहिक कत्ल के मुजरिम की दया-याचिका. जिसे राष्ट्रपति ने खारिज कर दिया.

अतीत के पन्ने पलटने पर देखने को मिलता है कि राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने, अपने कार्यकाल में फांसी की सजा पाए जिन मुजरिमों की दया याचिकाएं खारिज कीं उनमें, पहली दया याचिका जगत राय की थी. जगत राय को 2006 में अंजाम दिए गए सामूहिक कत्ल की घटना का मुजरिम करार देने के बाद, ट्रायल कोर्ट ने उसे मृत्युदंड की सजा मुकर्रर की थी. ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ मुजरिम हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट गया. हर जगह मगर मुजरिम को वजन न देकर, ट्रायल कोर्ट के फैसले को ही सर्वोपरि और सर्वमान्य करार दिया गया. लिहाजा लाख जतन के बाद भी पांच बच्चों और उनकी मां के कत्ल का मुजरिम जगत राय खुद की सजा-ए-मौत खारिज नहीं करा सका. सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में उसकी याचिका खारिज करके ट्रायल कोर्ट से उसे मिली फांसी की सजा को बरकरार रखा था.

जगत राय ने 2006 में किया था 6 लोगों का कत्ल

इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने (सजा सुनाने वाली निचली अदालत) जगत राय (Jagat Rai Murderer) द्वारा अंजाम दिए गए लोमहर्षक सामूहिक हत्याकांड को दुर्लभ से दुर्लभतम की (रेयर ऑफ रेयरेस्ट) की श्रेणी में रखा था. जगत राय जैसे क्रूर शख्स ने 2006 में बिहार के वैशाली जिले के रामपुर श्यामचंद्र गांव (Bihar Vaishali Rampur Shyam Chandra Village Family Murder) में, मकान में आग लगाकर 6 लोगों को कत्ल कर डाला था. उस लोमहर्षक कांड को अंजाम षडयंत्र के तहत दिया गया था. उस घटना की जानकारी परिवार के मुखिया विजेंद्र महतो ने पुलिस को दी थी. मरने वालों मे विजेंद्र मुखिया की पत्नी और उसके 5 बच्चे थे. पुलिस ने कत्ल का मुकदमा दर्ज करके कोर्ट में आरोपी जगत राय को पेश किया था. मुलजिम के खिलाफ सबूत और गवाह इस कदर के मजबूत थे कि, ट्रायल कोर्ट ने जगत राय को सजा-ए-मौत मुकर्रर कर दी.

पांच मासूम और उसकी मां की हत्या के आरोप में फांसी की सजा से बचने के लिए मुजरिम जगत राय हाईकोर्ट पहुंचा. हाईकोर्ट ने भी उसकी याचिका खारिज करके सजा-ए-मौत बरकरार रखी. यही कमोबेश सुप्रीम कोर्ट में भी हुआ. सुप्रीम कोर्ट ने भी जब मुजरिम को राहत नहीं दी तो वो, खुद को फांसी के फंदे से बचाने के लिए दया याचिका के जरिए राष्ट्रपति की देहरी पर पहुंचा. राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने दया याचिका को खारिज कर दिया. ऐसा नहीं है कि राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने अपने कार्यकाल में सिर्फ जगत राय जैसे सजायाफ्ता मुजरिम की ही दया याचिका ठुकराई हो. उन्होंने देश-दुनिया को झकझोर देने वाले निर्भया बलात्कार और हत्याकांड के आरोपियों की भी दया याचिका ठुकरा दी थी. जिसके बाद ही निर्भया के कातिलों को फांसी के फंदे पर झुला दिया गया था.

निर्भया के दोषियों की दया याचिका भी ठुकराई

दरअसल यहां बताना जरूरी है कि भारत के राष्ट्रपति को संविधान के अनुच्छेद-72 के अंतर्गत यह विशेषाधिकार होता है कि, वे चाहें तो मृत्युदंड पाए किसी भी मुजरिम की सजा माफ या कम कर सकते हैं. हालांकि निर्भया कांड के आरोपियों मुकेश सिंह, पवन गुप्ता, विनय शर्मा और अक्षय कुमार सिंह के मामले में राष्ट्रपति ने अपने इस विशेषाधिकार का इस्तेमाल नहीं किया था. तभी उन चारों को फांसी के फंदे पर लटकाया जा सका था. दिल्ली पुलिस की पड़ताल के आधार पर उन सभी को दिल्ली की फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा सजा-ए-मौत सुनाई गई थी. राष्ट्रपति सचिवालय के अनुसार राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद द्वारा अपने कार्यकाल में, जिस अंतिम दया याचिका को खारिज किया गया वो थी संजय नाम के मुजरिम की दया याचिका. वो दया याचिका राष्ट्रपति ने जुलाई 2020 में खारिज कर दी थी.

हालांकि संजय को ट्रायल कोर्ट द्वारा संजय को फांसी की सजा जुलाई 2006 में सुनाई गई थी. बात अगर मौजूदा राष्ट्रपति से पूर्व प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति काल की करें तो, उन्होंने अपने कार्यकाल में 30 दया याचिकाओं को खारिज किया था. जबकि 4 मुजरिम को माफी दी थी. तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने जिन मुजरिम की दया-याचिकाएं खारिज की थीं उनमें, याकूब मेनन (1993 मुंबई बम धमाके), अफजल गुरु (संसद हमला), अजमल कसाब (मुंबई हमला) जैसे खूंखार अपराधियों का नाम प्रमुख था. इन सभी को बाद में फांसी के फंदे पर लटका दिया गया.

प्रणब मुखर्जी ने खारिज की थीं 45 दया याचिकाएं

हालांकि दया याचिकाएं खारिज करने का रिकॉर्ड देखा जाए तो, प्रणब मुखर्जी से पहले राष्ट्रपति रहे आर वेंकणरमण ने अपने कार्यकाल में रिकॉर्ड 45 दया याचिकाओं को खारिज कर दिया था. हालांकि केआर नारायणन के राष्ट्रपति काल में किसी भी याचिका पर फैसला नहीं दिया जा सका था. जबकि देश की पहली महिला राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने 34 दया याचिकाओं पर फैसला दिया था. जिनमें से 5 दया याचिकाएं उन्होंने खारिज कर दीं. बात अगर आज के परिप्रेक्ष्य में की जाए तो इस वक्त 2015 से लेकर सरकार के पास तीन दया याचिकाएं जहां लंबित हैं. वहीं 2 दया याचिकाएं केंद्रीय गृह मंत्रालय के पास 2021 से लंबित हैं.

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