सांप्रदायिक तनाव से भारत को आर्थिक मोर्चे पर हो सकता है नुकसान

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अगर चार्ल्स डिकेंस ने आज के भारत को देखा होता, तो शायद उन्हें यही कहना पड़ता कि इस देश के लिए यह सबसे अच्छा दौर है और सबसे बुरा भी. सबसे अच्छा इसलिए, क्योंकि अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे के मोर्चे पर भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है. और सबसे बुरा इसलिए, क्योंकि मौजूदा सांप्रदायिक तनाव इतना बढ़ गया है जो देश को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है.पहले अच्छी बातों को देखते हैं. आधिकारिक दावों और आंकड़ों के अनुसार हमने आर्थिक मोर्चे पर क्या हासिल किया है

* साल-दर-साल आधार पर जून (मई की बिक्री) में जीएसटी कलेक्शन 55.8 फीसदी बढ़कर 1,44,616 करोड़ रुपये हो गया. जुलाई 2017 के इस व्यवस्था के आने के बाद से यह दूसरा सबसे उच्चतम स्तर है.

* भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने केवल 5 दिनों में 75 किमी हाईवे बनाकर गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया है. इसने 3 जून को सुबह 7:27 बजे सड़क निर्माण शुरू किया और 7 जून को शाम 5 बजे 75 किमी का निर्माण पूरा कर लिया. यानी, 105 घंटे 33 मिनट के रिकॉर्ड समय में काम पूरा हो गया.

* डॉलर के मुकाबले रुपया का स्तर ठीक ठाक है. अभी भारत का विदेशी मुद्रा भंडार करीब $590 बिलियन है. हालांकि, 2021 के आखिर में व्यापार घाटे की भरपाई करने के कारण इसमें लगभग $40 बिलियन की कमी आई है. चीन को छोड़कर पड़ोसी देशों के साथ तुलना करें तो भारत ने न केवल दिवालिया हो चुके श्रीलंका की मदद की, बल्कि मध्य एशियाई देशों जैसे अफगानिस्तान, ईरान, मिस्र और कुछ दूसरे देशों की भी सहायता की. आरबीआई के अनुसार, भारत का गोल्ड रिजर्व 760.42 टन है. दक्षिण एशिया और यहां तक कि दुनिया में भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही है. ऐसे वक्त जब उसके दो पड़ोसी देश श्रीलंका और पाकिस्तान दिवालिया हो चुके हैं.

लेकिन, इन दिनों धार्मिक विवाद, ईशनिंदा और सांप्रदायिक तनाव के कारण हत्याएं जैसी खबरें सुर्खियों में हैं.

‘राजनीति कोई खेल नहीं बल्कि एक गंभीर कारोबार है…’

विंस्टन चर्चिल ने एक बार कहा था, “राजनीति कोई खेल नहीं बल्कि एक गंभीर कारोबार है.” लेकिन ये कारोबारी अपने काम में इतने माहिर हैं कि वे आपको वास्तविक मुद्दों के बारे में सोचने और उनके बारे में बात करने के लिए समय नहीं देंगे.

उदाहरण के लिए, सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, जून में भारत में बेरोजगारी की दर बढ़कर 7.8 प्रतिशत हो गई. इसका कारण ग्रामीण इलाकों में बेरोजगारी का बढ़ना है. हालांकि, मई में रिटेल मुद्रास्फीति (7.04 प्रतिशत) पर आ गई, लेकिन यह अभी भी आरबीआई के स्वीकार्य स्तर से ऊपर है. कितने टीवी चैनल इन मुद्दों पर बहस करते हैं?

इन दिनों भारत में हम जो कुछ भी देख रहे हैं उसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं. यह ‘तेरा धर्म बनाम मेरा धर्म’ तक सीमित नहीं है. इसके आर्थिक दुष्परिणाम भी हैं. नूपुर शर्मा विवाद के बाद दुनिया भर की – विशेष रूप से खाड़ी देशों की – नाराजगी इसका उदाहरण है.

इस्लामिक देशों से कारोबारी संबंध बनाने की कोशिश में भारत

भारत इन दिनों इस्लामिक देशों के साथ कारोबारी संबंध बनाने की कोशिश कर रहा है. मलेशिया के साथ बड़ा रक्षा सौदा होने को है. यह देश अपने पुराने फाइटर जेट्स को बदलने की तैयारी कर रहा है और भारतीय हल्का लड़ाकू विमान तेजस उसकी पसंद के रूप में उभरा है. हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर आर माधवन ने एक इंटरव्यू में पीटीआई को बताया, “बातचीत लगभग अंतिम चरण में है. रूस के अलावा, हम एकमात्र ऐसे देश हैं जो उन्हें उनके एसयू-30 लड़ाकू जेट के लिए सहायता दे रहे हैं. मुझे भरोसा है कि यह डील हो जाएगी, बशर्ते कोई राजनीतिक बदलाव नहीं होता.”

फिलीपींस को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल निर्यात करने के 375 मिलियन डॉलर के सफल सौदे के बाद भारत की अब मिस्र के साथ बातचीत चल रही है. मिस्र की दिलचस्पी तेजस एमके 1A में है. मलेशिया और मिस्र दोनों ही मुस्लिम बहुल देश हैं. यदि ‘राजनीतिक बदलाव’ के कारण ये सौदे खतरे में पड़ते हैं तो क्या यह नुकसान की बात नही होगी?

देश में बढ़ता ध्रुवीकरण, खाड़ी देशों के साथ संबंधों को खराब कर सकता है. खासकर गल्फ कॉरपोरेशन काउंसिल (GCC) के साथ. इस समूह में बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान, सऊदी अरब, कतर और कुवैत जैसे देश शामिल हैं. पिछले वित्त वर्ष में सऊदी अरब भारत का चौथा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार था.

तेल और प्राकृतिक गैस के लिए भारत खाड़ी देशों में निर्भर

दूसरी चीजों के अलावा, भारत तेल और प्राकृतिक गैस के लिए खाड़ी देशों पर बहुत अधिक निर्भर है. भारत का हित व्यापार, निवेश और इस देशों में करीब 6.5 मिलियन भारतीय लोगों की उपस्थिति में हैं. 2020-21 के दौरान जीसीसी देशों के लिए भारत का निर्यात 28.06 बिलियन अमेरिकी डॉलर था. जबकि इसी अवधि में दोतरफा कारोबार 87.36 बिलियन अमेरिकी डॉलर था.इन मोर्चों पर नुकसान हो रहा है. देश का सांप्रदायिक विभाजन एक गलत संदेश देगा. एक तनावपूर्ण देश दूसरों को कैसे मदद कर सकता है? स्पष्ट है कि नुकसान हमें ही होगा.

भारत के हालात को अपने हिसाब से देखेंगे इस्लामिक देश

इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में अर्थशास्त्री और प्रोफेसर, अरुण कुमार ने टीवी 9 से बात करते हुए देश में सांप्रदायिक विभाजन के दो पहलुओं की ओर इशारा किया.

“एक आंतरिक है और दूसरा बाहरी. बाहरी पहलू यह है कि भविष्य को देखते हुए इन्वेस्टमेंट किया जाता है. और यदि देश के हालात स्थिर नहीं होते तो निवेश कम हो जाता है और यदि निवेश कम होगा तो विकास दर पर असर पड़ेगा. साथ ही रोजगार भी प्रभावित होता है.”

प्रो. कुमार के मुताबिक, “इस्लामिक देश भारत के हालात को अपने हिसाब से देखेंगे. उन देशों में यह सोच पैदा होगी कि भारत में मुसलमानों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता. इस पर वे प्रतिक्रिया देंगे. इससे हमारे कारोबार को चोट पहुंचेगी. एनर्जी एक्सपोर्ट, विशेष रूप से पेट्रोलियम के लिए, हम इस्लामी देशों पर निर्भर हैं. इन हालातों में इस पर असर पड़ सकता है.”

उन्होंने आर्थिक विकास के बीच देश में तनावपूर्ण सांप्रदायिक माहौल के बारे में आगाह किया.

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