मुस्लिम मौलवियों और कबायली बुजुर्गों से मान्यता चाहता है तालिबान

Afghan Women Peace And Freedom Organisation

काबुल में तालिबान के प्रचारित एजेंडे पर विचार-विमर्श करने के लिए हजारों अफगान धार्मिक हस्तियां और कबायली नेता मिल रहे हैं. अफगानिस्तान में शासन के लिए समर्थन बनाए रखने के लिए इस एजेंडे को तैयार किया गया है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तालिबान अभी अलग-थलग है. इस देश में यह सम्मेलन ऐसे वक्त हो रहा है जब यहां गंभीर आर्थिक और मानवीय संकट बना हुआ है. इस संकट की वजह से आबादी का बड़ा हिस्सा भारी अभाव, भुखमरी और बीमारियों की चपेट में है. सरकारी नौकरियों के साथ, जो लाखों परिवारों की आय का अहम स्रोत था, निजी कारोबार ढह रहे हैं. बुद्धिजीवी और पेशेवर देश छोड़कर भाग रहे हैं. इन दिनों अफगानिस्तान पर अस्तित्व का संकट छाया हुआ है. जब से तालिबानी सत्ता में आए हैं. उसने मुख्य रूप से महिलाओं की आजादी को एक तरह से छीन लिया गया है. महिलाओं के लिए घरों में रहना और सिर से पैर तक बुर्का पहनना अनिवार्य है.

तालिबान ने शिक्षा को निशाना बनाया है. को-एजुकेशन वाले संस्थानों को गैरकानूनी घोषित कर दिया है. लड़कियां केवल छठी कक्षा तक पढ़ाई कर सकती हैं. महिलाओं को काम नहीं करने दिया जा रहा है, जिससे महिला मुखिया वाले हजारों परिवारों को भुखमरी का सामना करना पड़ रहा है. अफगान सिविल सोसाइटी कोऑर्डिनेशन सेंटर के अनुसार 2015 तक अफगानिस्तान में 95 लाख छात्रों के साथ 16,400 स्कूल-कॉलेज थे, जिनमें 40.5 फीसदी लड़कियां पढ़ती थीं. तालिबान के सत्ता में लौटने से सबसे बुरा असर अफगान महिलाओं पर पड़ा है. अक्टूबर 2001 में तालिबान को अफगानिस्तान की सत्ता से बेदखल किए जाने के दो दशक बाद तक महिलाओं को आजादी मिली थी. इतनी आजादी कि जिसका उन्होंने पहले कभी आनंद नहीं लिया था. इस आजादी को छीनने की वजह से तालिबान शासन को महिलाओं के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा. महिलाओं ने काबुल और देश में अन्य जगहों पर सैकड़ों विरोध प्रदर्शन किए.

अफगानिस्तान में आय का कोई स्रोत नहीं रह गया

देश में भारी आर्थिक संकट की वजह से बहुत से परिवारों के पास आय का कोई स्रोत नहीं रह गया है. ऐसे में वे अपने को जीवित रखने के लिए घर का सामान बेच रहे हैं. रिपोर्टों के मुताबिक, काबुल के बाजार कालीन, कंबल, बर्तनों से भरे पड़े हैं. पक्तिका प्रांत में हालिया भूकंप में करीब 1,200 लोग मारे गए और हजारों घायल हुए. और अनुमान है कि 3,000 परिवार बेघर हो गए. हालांकि, दुनिया भर की सरकारों ने पीड़ितों को राहत देने के लिए मदद की, लेकिन इसने तालिबान शासन की अक्षमता को भी उजागर कर दिया. करीब 11 महीने पहले काबुल में काबिज हुए तालिबान के लिए देश चलाना एक चुनौती है. क्योंकि अमेरिका ने इसके फंड को फ्रीज कर दिया है और इसे दुनिया की कोई भी सरकार मान्यता नहीं दे रही है. इस सरकार को मान्यता देने के लिए कई शर्तें जुड़ी हुई हैं. इनमें समावेशी सरकार और निर्णय लेने वाली संस्थाएं, महिलाओं के लिए रोजगार और शिक्षा के अधिकार व व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ-साथ मानवाधिकार भी शामिल हैं. दूसरी ओर, तालिबान ने पिछले दशकों से हासिल आजादी को खत्म कर दिया. देश में जो भी संसाधन बचे हैं, उनपर कब्जा कर लिया और उन्हें केवल प्रांतों में बांटा जा रहा है जहां उन्हें समर्थन मिलता है, और जहां उनका विरोध होता है वहां के लोग भूखे मर रहे हैं. जैसे कि उत्तरी इलाकों में.

भारत सरकार ने 50,000 टन गेहूं भेजने का फैसला किया है

इस बीच दुनियाभर की सरकारें एक दुविधा में हैं. एक ओर तो अफगान लोगों की मदद करने की तत्काल आवश्यकता है, जबकि दूसरी ओर यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी आर्थिक सहायता का उपयोग तालिबान खुद के लिए न करे. ऐसा हुआ तो उसके लड़ाके अपनी ही आबादी का उत्पीड़न करना जारी रखेंगे. अफगान लोगों की पीड़ा को भांपते हुए पिछली सर्दियों में, भारत सरकार ने 50,000 टन गेहूं भेजने का फैसला किया, लेकिन केवल एक तिहाई माल की डिलीवरी हो पाई. इसका कारण पाकिस्तान में इमरान खान सरकार द्वारा मदद न देना था.पाकिस्तान को किनारा करने के लिए, भारत ने तालिबान से सीधे डील करने का फैसला किया और भारतीय दूतावास में संपर्क खिड़की खोल दिया. भूकंप के पीड़ितों के लिए छह टन मेडिकल सामान भेजे गए. यहां तक कि काबुल गुरुद्वारे पर हुए हमले के बावजूद, जिसमें दो लोगों की मौत हो गई थी, नई दिल्ली ने यह तय कर लिया है कि अफगान से दूरी बनाए रखने बजाए उसके साथ आना बेहतर है.

अमेरिका के अचानक हटने से तालिबान को आसानी से मिल गई सत्ता

अमेरिका के अफगानिस्तान से अचानक हटने के फैसले से तालिबान को आसानी से सत्ता मिल गई. इसके बाद अमेरिकी प्रशासन ने महीनों तक इस देश से मुंह मोड़ लिया, लेकिन अब लगता है कि इसने सीमित जुड़ाव की रणनीति अपनाने का फैसला किया है. बुधवार को तालिबान के एक प्रतिनिधिमंडल ने अपने तथाकथित विदेश मंत्री अमीर खान मुतक्की के नेतृत्व में दोहा में अमेरिकी विशेष प्रतिनिधि डेविड वेस्ट से मुलाकात की. बाइडेन प्रशासन द्वारा 9.5 बिलियन डॉलर के फंड का एक हिस्सा जारी करने के संबंध में यह मुलाकात की गई. दूसरे देश भी अफगानिस्तान को मान्यता देने के बजाए सीमित जुड़ाव रखना चाहते हैं.

यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से तजाकिस्तान की अपनी पहली विदेश यात्रा के दौरान, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अपने ताजाकी समकक्ष इमामोली रहमान के साथ एक बैठक के दौरान कहा कि रूस तालिबान के साथ जुड़ाव बढ़ाएगा ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि सभी जातीय समूह मिलकर सरकार चलाएं. ताजिकिस्तान, तालिबान विरोधी नार्दन अलाएंस का समर्थक है. इस अलाएंस में अफगानिस्तान में रह रहे ताजाकी लोग शामिल हैं. पैसों-पैसों के लिए मोहताज तालिबान दुनिया भर की सरकारों के पास जा रहा है, लेकिन कोई सरकार काम नहीं आ रही. चीन, सऊदी अरब और कतर की सरकारों सहित सहानुभूति रखने वाली दूसरी सरकारें भी कोई मदद नहीं कर रही हैं. तालिबान को समर्थन देने वाला पाकिस्तान खुद बदहाल है. ऐसा लगता है कि अंतरराष्ट्रीय अलगाव की वजह से तालिबान ने लोया जिरगा का आयोजन करने का फैसला किया ताकि मौलवियों और आदिवासी बुजुर्गों द्वारा कुछ हद तक मान्यता हासिल की जा सके.

“अफगानों को मारना हमारा इरादा नहीं था”

तालिबान लोया जिरगा को इतना महत्व देता है कि उनके सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा ने गुरुवार को इस सम्मेलन के उद्घाटन में भाग लिया और सरकार की ज्यादतियों का बचाव करते हुए कहा कि “अफगानों को मारना हमारा इरादा नहीं था”. उन्होंने कारोबारियों से वापस लौटने का अनुरोध किया और उन्हें देश में निवेश करने के लिए कहा. लेकिन जिरगा की शुरुआत खराब रही. आयोजन स्थल पर गोली चलाने वाले कुछ बंदूकधारियों को तालिबानियों ने मार डाला. महिलाओं और मीडिया को इसमें भाग नहीं लेने दिया गया. इन वजहों से इस कार्यक्रम का दुष्प्रचार हुआ. इसके कारण महिलाओं और पत्रकारों ने जोरदार विरोध किया. असल में तालिबान को डर था कि कई लोग उसके शासन के खिलाफ बोलेंगे.

अफगान समाचार एजेंसी टोलोन्यूज ने कई महिला शिक्षकों और छात्रों और यहां तक कि मुस्लिम विद्वानों के हवाले से मांग की कि स्कूल खोले जाएं. और भी बुरा होना बाकी था. जिरगा में शामिल होने वाले मौलवियों में से एक ने तालिबान के विरोधियों का सिर कलम करने का आह्वान किया. उसके मुताबिक, विरोध करने वाले लोग इस्लाम के दुश्मन हैं. इस मौलवी ने कहा, “विरोधियों और आलोचकों का तुरंत सिर कलम कर दिया जाना चाहिए. इससे शहीदों की आत्मा खुश होगी और सिस्टम मजबूत होगा.” इससे तालिबान को जरा भी मदद नहीं मिलने वाली है. दुनिया को अफगानिस्तान की मदद करनी चाहिए, लेकिन यह सुनिश्चित करना चाहिए कि तालिबान पर लगाम लगे. वास्तव में, तजाकिस्तान सीमा पर स्थित नार्दन अलाएंस का समर्थन कर इन मध्यकालीन बर्बर लोगों पर नियंत्रण किया जा सकता है.

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