पैगंबर मुहम्मद पर टिप्पणी से लेकर काली के पोस्टर तक… हाल के वर्षों में बढ़े हैं ऐसे मामले, कानून क्या कहता है और कहां फंसता है पेच?

Ipc Section 295a Explained

हाल के कुछ वर्षों में देश में ऐसे मामलों की संख्या बढ़ गई हैं, जिनमें या तो किसी वर्ग की धार्मिक भावनाएं (Religious Sentiments) आहत हो रहीं या फिर राजनीति से प्रेरित होकर केस दर्ज कराए जा रहे हैं. हाल-फिलहाल में तो ऐसे कई सारे मामले सामने आए हैं. दक्षिण भारतीय फिल्ममेकर लीना मणिमेकलाई की डॉक्युमेंट्री ‘काली’ के पोस्टर (Kali Poster Row) को लेकर कई मामले दर्ज कराए गए हैं. इसके पोस्टर में हिंदू धर्म में आराध्य मां काली के लुक में नजर आ रही महिला को सिगरेट का कश खींचते हुए दिखाया गया है. उनके एक हाथ में LGBTQ+ समुदाय का झंडा भी है. इसको लेकर ​कई हिंदू संगठनों ने आपत्ति जताई है. न केवल देश में बल्कि विदेश में भी. कनाडा में भारतीय उच्चायोग ने संज्ञान लेते हुए नाराजगी जताई है और वहां के अधिकारियों से ऐसे कंटेंट को बढ़ावा न देने की अपील की है.

अ​भी हाल ही में राजस्थान के उदयपुर में दर्जी कन्हैयालाल की केवल इसलिए गला काटकर बेरहमी से हत्या कर दी गई, क्योंकि उनके मोबाइल से गलती से एक पोस्ट शेयर कर दी गई थी. यह पोस्ट, पिछले दिनों पैगंबर मुहम्मद पर टिप्पणी करने वाली बीजेपी से निलंबित नुपूर शर्मा के समर्थन में थी. हालांकि इसे तुरंत हटा लिया गया था. बाद में इस मामले की जांच पुलिस की विशेष टीम के अलावा एनआईए को भी सौंपी गई. आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है.

हाल के दिनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं.आइए जानते हैं इनमें कानून क्या कहता है और क्या ऐसे मामलों में कोई पेच भी है!

IPC की धारा 295ए

उत्तर प्रदेश के संभल में एक ढाबा चलाने वाले तालिब हुसैन को यूपी पुलिस ने गिरफ्तार किया है. उनके खिलाफ हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीरों वाले अखबार में मांसाहारी खाना पैक करने की शिकायत की गई थी. शिकायत करने वाले का कहना था कि ऐसा करने से उसकी धार्मिक भावनाएं आहत हुई थीं. इस मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 295 ए के तहत यह शिकायत की गई थी, जिसमें दोषी पाए जाने पर तीन साल तक जेल की सजा का प्रावधान भी है.

भारतीय दंड संहिता की धारा 295A के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति भारतीय समाज के किसी भी वर्ग के धर्म या धार्मिक भावनाओं को आहत करने के इरादे से दुर्भावनापूर्ण जानबूझकर कोई काम करता है या ऐसा कोई बयान देता है तो उसे दोषी माना जाएगा. अब इस तरह का कोई कंटेंट शेयर करने पर भी यही धारा लागू होती है.

IPC 1860 की धारा 295A के तहत दोषी पाए जाने पर व्यक्ति को 2 साल या अधिकतम तीन साल की सजा और आर्थिक जुर्माने का प्रावधान है. गंभीर अपराध की स्थिति में दोषी पर सजा और जुर्माना दोनों लगाए जा सकते हैं.

IPC की धारा 153

सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने वाले अधिवक्ता प्रशांत नारंग बताते हैं कि ऐसे मामलों में कानून की एक और धारा लगाई जाती है- 153. भारतीय दंड संहिता के चैप्टर आठ में अंकित धारा 153 में उकसाने या दंगा भड़काने की प्रक्रिया को लेकर प्रावधान हैं. जैसे कि यदि कोई व्यक्ति किसी धर्म, जाति-समुदाय या संप्रदाय या धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला ऐसा काम करता है, जिससे सामाजिक शांति में किसी तरह की बाधा होती है या दो समुदायों के बीच द्वेष फैलता है और दंगा की स्थिति पैदा होती है तो धारा 153 के तहत उस व्यक्ति को दोषी माना जाएगा.

इसमें सजा के लिए 2 प्रावधान हैं. पहला जब व्यक्ति की बात से दंगा या उपद्रव होता है तो उसे एक साल या फिर पांच साल तक की सजा या आर्थिक दंड दिया जा सकता है. वहीं गंभीर अपराध की श्रेणी में यानी परिणाम गंभीर होने पर दोनों दंड दिए जाने का भी प्रावधान है. दंगा या उपद्रव न होने की स्थिति में भी 6 महीने तक की सजा, आर्थिक दंड या दोनों का प्रावधान है.

थोड़ा अस्पष्ट है कानून!

पिछले दिनों ऑल्टन्यूज के सह संस्थापक जुबैर के खिलाफ शिकायत का आधार उनके द्वारा 2018 में किया गया एक ट्वीट है. इस मामले में यह पुलिस और कोर्ट को तय करना है कि जुबैर ने किस तरह भावनाओं को आहत पहुंचाया है. मो ज़ुबैर को पुलिस ने जिन धाराओं के तहत गिरफ्तार किया उनमें यह धारा भी शामिल है. हालांकि उनके जिस ट्वीट के खिलाफ ‘धार्मिक भावनाएं आहत’ करने की शिकायत की है वो ट्वीट उन्होंने 4 साल पहले की थी.

पटना हा​ईकोर्ट के अधिवक्ता शानू कहते हैं कि कई मामलों में छोटी-छोटी बातों पर भी कोई द्वेषवश या राजनीति से प्रेरित होकर शिकायत कर देता है और फिर पुलिस आरोपित व्यक्ति को गिरफ्तार भी कर लेती है. उनके मुताबिक, यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि अगर आप किसी के बयान, पोस्ट, मैसेज या काम से आहत होने के बाद कोई कितने दिन बाद तक उसके खिलाफ शिकायत कर सकता है.

कई एफआईआर हों तो बढ़ जाती हैं मुश्किलें

मई 2022 की ही घटना है. महाराष्ट्र में अभिनेत्री केतकी चितले को उनकी एक फेसबुक पोस्ट की वजह से गिरफ्तार कर लिया गया था. चितले ने फेसबुक पर मराठी में किसी और की लिखी एक कविता शेयर की थी. इसमें जिस व्यक्ति की आलोचना की गई है, उसका चित्रण एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार से मिलता-जुलता है. इस एक पोस्ट के लिए ठाणे पुलिस की क्राइम ब्रांच ने IPC की धारा 500 (मानहानि), 501 (मानहानि संबंधित कंटेंट प्रकाशित करना) और 153ए (दो समुदायों के बीच द्वेष फैलाना) के तहत मामला दर्ज किया था.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ठाणे समेत महाराष्ट्र के कई जिलों में केतकी चितले के खिलाफ कुल 22 एफआईआर दर्ज की गई थीं. इनमें से सिर्फ एक मामले में उन्हें जमानत मिली है और वह जेल से बाहर आ पाईं. 21 मामलों की सुनवाई अभी होनी बाकी है.

नुपूर शर्मा के खिलाफ भी देश के कई राज्यों में मामले दर्ज कराए गए हैं. इन मामलों में राहत की उम्मीद में वह सुप्रीम कोर्ट की शरण में गई थीं और सभी मामलों को मर्ज कर दिल्ली में सुनवाई का आग्रह किया था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट से उन्हें फटकार मिली.

.. अगर सबूत नहीं जुटा पाए पुलिस

कानून पुलिस को गिरफ्तारी की इजाजत देता है लेकिन उस​की एक तय प्रक्रिया है. कई मामलों में पुलिस सीमा से आगे बढ़ती भी दिखती है. पूर्व में पत्रकार रहे एक अन्य अधिवक्ता रुप कुमार कहते हैं, कई बार पुलिस राजनीतिक​ निर्देशों के तहत ऐसा करती हैं. वहीं कई मामलों में अदालतें पुलिस को गलत रहने पर फटकार भी लगाती हैं और आरोपी को बरी करती हैं.

पिछले महीने सहारनपुर में पैगंबर मोहम्मद के कथित अपमान के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों को लेकर कुछ लोगों ​की गिरफ्तारी हुई थी. बाद में पुलिस द्वारा आरोपियों की पिटाई का वीडियो भी वायरल हुआ था. आठ आरोपी जेल में एक महीने बंद रहे, लेकिन पुलिस उनके खिलाफ कोई भी सबूत नहीं जुटा पाई. इकट्ठा नहीं कर पाई. तीन दिन पहले रविवार, 3 जुलाई को उन्हें अदालत ने उन्हें बरी कर दिया.

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