पश्चिम एशिया में अप्रत्याशित तरीके से बदलते समीकरण क्यों भारत के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकते हैं

Ukraine Ap 19m

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन (US President Joe Biden) की सऊदी अरब की आगामी यात्रा इस बात का उदाहरण है कि कैसे महादेशों के भीतर और महाद्वीपों के बीच, खासकर यूक्रेन संघर्ष के मद्देनजर गठबंधन बदल रहे हैं. इस महीने होने वाली प्रस्तावित यात्रा रूस-चीन-ईरान के बीच संभावित साझेदारी के खिलाफ अपने सहयोगियों को खड़ा करने वाले अमेरिकी प्लान का हिस्सा है. जाहिर तौर पर अमेरिका ने यू-टर्न लेते हुए नीतिगत बदलाव करने का फैसला किया है, जो कि पिछले साल सउदी – खासतौर पर बीमार राजा के उत्तराधिकारी और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (Mohammed bin Salman) को अलग-थलग करता दिख रहा था.

वजह साफ है. औद्योगिक रूप से संपन्न पश्चिमी देशों सहित पूरी दुनिया खनिज तेलों की कीमतों में कमरतोड़ महंगाई का सामना कर रही है. यूक्रेन संघर्ष और रूस के खिलाफ प्रतिबंधों के बाद विश्व के दूसरे सबसे बड़े उत्पादक ने सप्लाई में कटौती की है जो दुनिया भर में बेहद अलोकप्रिय है.

दुनिया भर के बाजारों में युद्ध, प्रतिबंध और इसके परिणामस्वरूप तेल की कमी को उच्च कीमतों के लिए जिम्मेदार ठहराने का पश्चिमी प्रयास हजम नहीं हो रहा है. उत्पादन बढ़ाने के लिए तेल उत्पादकों के संघ ओपेक (OPEC) को मनाने का अमेरिकी प्रयास विफल रहा है.

अमेरिका में तेजी से बढ़ रही गैसोलीन की कीमत

जहां कम संपन्न देश भारी मुसीबतों का सामना कर रहे हैं, अमीर देश भी अच्छी स्थिति में नहीं हैं.

पूरे अमेरिका में पंपों पर गैसोलीन की कीमत $5 को छू रही है, जो 1991 से 2022 तक के तीन दशकों के औसत $2.5 से बहुत अधिक है. जब तक तेल की कीमत मौजूदा $120-प्लस प्रति बैरल से कम होकर 100 से कम नहीं हो जाती, तब तक कई असुरक्षित देश आर्थिक मंदी के मामले में श्रीलंका का अनुसरण करने के लिए तैयार हैं.

आसपास मंडराते वैश्विक आर्थिक संकट को तभी टाला जा सकता है, जब तेल उत्पादक देश धरती से अधिक तेल पंप करें और बाजार में अधिक तेल की सप्लाई करें.

इस मायने में दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल उत्पादक सऊदी अरब (Saudi Arabia) की चर्चा महत्वपूर्ण है. अमेरिका को सउदी, खास तौर पर मोहम्मद बिन सलमान अल सउद (Mohammed bin Salman Al Saud) के रूख को नरम करने की जरूरत है, और यही जो बाइडेन की आगामी यात्रा की व्याख्या करता है.

गलतियों को स्वीकार करने वाला कार्यक्रम

अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए यह अपनी गलतियों को स्वीकार करने वाला कार्यक्रम है. खास तौर पर यह देखते हुए कि बाइडेन ने अपने चुनावी अभियान के दौरान मोहम्मद बिन सलमान को यूएस-बेस्ड सऊदी पत्रकार जमाल खशोगी (Jamal Khashoggi) की हत्या के लिए जिम्मेदार बताया था, जिनके वाशिंगटन पोस्ट में छपे लेख ने सऊदी प्रिंस को नाराज़ किया था.

2018 में खशोगी को अंकारा स्थित सऊदी दूतावास ले जाया गया, जहां मोहम्मद बिन सलमान द्वारा भेजे गए लोगों द्वारा उनकी हत्या कर दी गई. हत्यारों ने उनके शरीर को टुकड़ों में काटकर फेंक दिया.

इस हत्या ने दुनिया को झकझोर कर रख दिया. एर्दोगन (Erdogan) सरकार ने उन लोगों को गिरफ्तार किया और सऊदी सरकार पर हत्या का आदेश देने का आरोप लगाया. डोनाल्ड ट्रम्प के समय सउदी और शाही परिवार के करीब रहने वाले अमेरिका ने कुछ सहानुभूतिपूर्ण आवाजें उठाईं लेकिन कार्रवाई नहीं की.

लेकिन चीजें बदल जाती हैं. अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते व्यापारिक तनाव और रूस-चीन की गहरी होती साझेदारी ने अमेरिकी सैन्य-खुफिया प्रतिष्ठान को चिंतित कर दिया.

अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान खशोगी की हत्या हुई और ट्रंप की सऊदी से नजदीकी चुनावी मुद्दा बन गई. बाइडेन ने हत्या के लिए सउदी को जिम्मेदार ठहराने और इसे साबित करने का वादा किया.

पिछले साल फरवरी में जीत की पहली लहर में बाइडेन ने खशोगी की हत्या में मोहम्मद बिन सलमान की संलिप्तता पर सीआईए रिपोर्ट जारी की. रिपोर्ट ने एमबीएस पर उंगली उठाई, लेकिन हत्या में उसकी संलिप्तता का पर्याप्त सबूत नहीं दिया गया. हालांकि उस वक्त अमेरिका 6 जनवरी को द कैपिटल पर हुए हमले से इतना आहत था कि रिपोर्ट पर करीब से नज़र नहीं डाली जा सकी. इसके बावजूद, अमेरिका-सऊदी संबंधों में गिरावट आई.

ईरान के परमाणु विकास कार्यक्रम पर पेरिस समझौते में बाइडेन प्रशासन के लौटने की संभावना ने भी मदद नहीं की. इस बीच सउदी-चीन आर्थिक संबंध तेजी से बढ़ते चले गए. अगस्त 2021 में चीन ने तेल-समृद्ध साम्राज्य के सबसे बड़े व्यापारिक भागीदार के रूप में अमेरिका की जगह हथिया ली.

अमेरिका के बहिष्कार में शामिल नहीं हुए वेस्ट एशिया के देश

और फिर आया यूक्रेन संघर्ष. अमेरिका के निकटतम सहयोगियों में शामिल पश्चिम एशिया (West Asia) के तेल उत्पादक देश रूसी वस्तुओं और कंपनियों के बहिष्कार में शामिल नहीं हुए.

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस विरोधी प्रस्ताव पर यूएई (UAE) ने भाग नहीं लिया. हालांकि अमेरिकी सहयोगियों के अलावा न तो संयुक्त अरब अमीरात और न ही सऊदी अरब ने रूस के साथ अपने फलते-फूलते व्यापारिक संबंधों को नुकसान पहुंचाना चाहते. उन्हें डर है कि रूस के विरोध और ओपेक प्लस (OPEC+) छोड़ने से तेल उत्पादक संघ का पतन हो जाएगा.

दुनिया भर में तेल की ऊंची कीमतों के कारण यूक्रेन युद्ध अलोकप्रिय हो गया है और रूस सस्ते सौदों की पेशकश कर रहा है. भारत सहित अधिकतर देश उसके खिलाफ प्रतिबंध लगाने से बच रहे हैं. इसने अमेरिका के लिए स्थिति को अस्थिर कर दिया है. उसे लगा कि बाजार में अधिक गैर-प्रतिबंध तेल उपलब्ध कराने के लिहाज से ओपेक को उत्पादन बढ़ाने पर राजी करने के उसके प्रयासों के बाद मध्यम-आय वाले शुद्ध तेल आयातक देश रूसी तेल खरीदने से मुकड़ जाएंगे.

लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तब बाइडेन प्रशासन को एहसास हुआ कि उसे सउदी को शांत करना होगा. इसके पीछे दोहरे उद्देश्य थे. तीसरे सबसे बड़े तेल उत्पादक को और अधिक पंप करने के लिए राजी करना, ओपेक के बाकी देशों को इसी लाइन पर आने के लिए मजबूर करना और सऊदी-चीन आर्थिक संबंधों को कम करना.

इसकी कीमत स्पष्ट थी. खशोगी हत्या मामले में एमबीएस को संदेह के घेरे से बाहर निकलना, यूएस-वेस्ट एशिया संबंधों को नया आयाम देने के क्रम में ऑयल किंगडम के अहमियत की पुष्टि करने के लिए जेद्दा की हाई-प्रोफाइल यात्रा करना और सउदी को आश्वस्त करना कि परमाणु समझौते से ट्रम्प के वाक-आउट को उलटने जैसा कोई यूएस-ईरान संबंध नहीं होगा. यह बाइडेन की आगामी यात्रा का एजेंडा होगा.

यूएस की पहल का जवाब सउदी पहले ही दे चुका है. सबसे बड़ी सऊदी अरामको (Saudi Aramco) सहित वहां की चार तेल कंपनियों ने अपने चीनी साझेदारों को सूचित किया है कि वे सप्लाई में लगभग आधी कटौती करेंगे. इससे चीन खनिज तेलों के लिए रूस पर लगभग पूरी तरह से निर्भर हो जाएगा. यह ऐसी स्थिति जो उसे पसंद नहीं है. बीजिंग अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए अपने प्रयासों और संसाधनों को किसी एक पर खर्च करना पसंद नहीं करता है. उसे यह भी सूट नहीं करता कि वह रूस के प्रति सहानुभूति रखता है.

यह सब भारत को कैसे प्रभावित करता है? नई दिल्ली के लिए यह एक चुनौती होगी क्योंकि विदेश मंत्रालय उम्मीद कर रहा था कि ईरान पर अमेरिका के नरम होने से दुनिया के दूसरे सबसे बड़े तेल आयातक के लिए बाजार में अधिक सस्ता तेल उपलब्ध होगा. भारत ने अब तक रूसी तेल खरीदकर तेल की कीमतों को तुलनात्मक रूप से कम रखा है, लेकिन मास्को से रियायती तेल खरीदने के खिलाफ पश्चिमी देशों का दबाव बढ़ रहा है.

तुर्की ने बदलते माहौल को पहचानने में देरी नहीं की

पूरी तरह से तेल आयातक देश तुर्की ने बदलते माहौल को पहचानने में देर नहीं की. वह खशोगी हत्याकांड की जांच पहले ही रोक चुका है और यहां तक कि पिछले महीने एमबीएस का खुले दिल से स्वागत भी कर चुका है.

भारत नहीं चाहता कि खाड़ी में उसके संबंध नवीनतम अमेरिकी चाल से प्रभावित हों. पश्चिम एशिया के खदान क्षेत्र के माध्यम से वह बेहद सधी चाल चलना चाहता है. क्षेत्र के तीन पावर सेंटर्स सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और इज़राइल के साथ इसके घनिष्ठ संबंध हैं. यह अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात और इज़राइल के I2U2 गठबंधन में भी शामिल हो गया है. लेकिन इसने ईरान के साथ घनिष्ठ और महत्वपूर्ण संबंध भी बनाए रखा है. चाबहार और अफगानिस्तान से होते हुए मध्य एशिया के एनर्जी मार्केट्स तक उसे कॉरिडोर बनाने की आवश्यकता होगी. असल में यही वजह थी कि भारत ने पिछले हफ्ते अपना काबुल दूतावास खोला.

जहां अमेरिका फिर से ईरान के खिलाफ सउदी के साथ हाथ मिला रहा है, भारतीय राजनयिकों की सेना, जो अब तक बड़ी कुशलता से देश की विदेश नीति को संभाल रही है, के सामने एक नई चुनौती जरूर खड़ी हो गई है.

इसे अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

Admission.com
www.lyricsmoment.com
admission9.com
lyricsmoment.com

Leave a Reply

Your email address will not be published.